इश्क मे तुझे माहताब लिख रहा हूँ में ।
तेरे लबों को तो गुलाब लिख रहा हूँ में ।।
तेरे इस मदहोश हुस्न की कसम ।
तुझे महकता हुआ गुलाब लिख रहा हूँ में ।।
इस कदर इश्क है तुझसे कि वयां नहीं होता ।
कि अल्फाजों मे हुस्ने शुमार वयां नहीं होता ।।
लिखूं मे और क्या तुझे ए हुस्ने मुजस्सिमा ।
तुझे तराशा हुआ बो नायाब लिख रहा हूं में ।।
तेरी जुल्फें हैं घटा सावन की तरहा ।
और ऑंखों को छलकता जाम लिख रहा हूँ में ।।
क्या लटकती हैं तेरे कानो की यह वाली ।।
बिंदिया माथे पर तेरे और होंठो की लाली ।
तुझे अब तो जाने बहार लिख रहा हूँ में ।।
इन मदमस्त अदाओ को क्या नाम दूं "शाकिर"
रात जो आया था बो हसीं ख्वाब लिख रहा हूं में।।
इश्क मे तुझे माहताब लिख रहा हूँ में ।
तुझे महकता हुआ गुलाब लिख रहा हूँ में ।।

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